हमारा आहार कैसा हो ? भाग १ (what should be in our diet? Part 1)
हमारा आहार कैसा
हो ? भाग १ (what should be in
our diet? Part 1)

आहार हमारे जीवन का आधार
ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण प्राणी जगत् के जीवन (प्राणों)
का आधार है। लेकिन आहार या जीवन पर विचार करते हुये, जीवन जीने का अवसर
केवल एक प्राणी को प्राप्त है जिसका नाम है मनुष्य। मनुष्य में तीन प्रकार की वृत्तियां होती हैं- सात्त्विक, राजसिक
और तामसिक। इन तीनों प्रकार के वृत्तियों का आधार आहार ही है। आहार के विषय में लोक प्रसिद्ध कहावत है- ‘जैसा खायें अन्न वैसा बने मन’।मनुष्य द्वारा खाया-पिया जाने वाला पदार्थं आहार कहलाता है। आहार के द्वारा शारीरिक, मानसिक
विकास होता है तथा दिनभर कार्यों को सम्पादित करने हेतु ऊर्जा प्राप्त होती है या यूं कह सकते हैं कि कार्यों को करने के लिए जिस ऊर्जा की आवश्यता होती है वो हमें आहार से मिलती है। श्रम से शारीरिक - मानसिक
क्षति की पूर्ति आहार से ही होती है।
आहार की आवश्यता
प्रत्येक व्यक्ति को उम्र तथा कार्य की दृष्टि से अलग-अलग होती है। हर व्यक्ति
एक जैसा आहार नहीं ले सकता क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति की प्रकृति अलग-अलग होती है जिसे
वात, पित्त व कफ कहते हैं। हमारा शरीर वय(उम्र) की
दृष्टि से बचपन में कफ, युवावस्था में पित्त तथा वृद्धावस्था में वात से प्रभावित
होता है। इन सबको ध्यान में रखते हुये हमें आहार का चुनाव करना चाहिए कि हमें हमारे शरीर के लिए किस तरह की आहार की आवश्यता है। हमें ऐसे आहार का चुनाव
करना चाहिए जो शरीर में विकार उत्पन्न न होने दे, रोग प्रतिरोधक क्षमता में
कमी न होने पाये। इसके लिए निम्न बातों पर ध्यान देना आवश्यक है-
शारीरिक श्रम प्रधान व्यक्ति को ऊर्जा प्रधान आहार अर्थात् मोटे अनाज की आवश्यकता अधिक होती है जैसे दाल, चावल, ज्वार, बाजरा, गेहूं, शाक-भाजी आदि। मानसिक श्रम प्रधान व्यक्ति को सूक्ष्म आहार की अधिक आवश्यकता होती है जैसे- दूध,
दही, फल, सूखे मेवे आदि।
मात्रा- आहार की मात्रा जठराग्नि के बल
की अपेक्षा रखती है - बौद्धिक श्रम करने वाले की कम
तथा शारीरिक श्रम करने वाले की अधिक होती है क्योंकि बौद्धिक श्रम की अपेक्षा शारीरिक श्रम करने वाले व्यक्ति की पाचन शक्ति मजबूत होती है। लेकिन इससे विपरीत देखा जाता है कि बौद्धिक कार्य करने वाले, धनाढ़य लोग जिनका कार्य नौकर-चाकर
ही करते है तथा निठले बैठने वाले लोग आवश्यकता से अधिक बिना विचारे कभी भी व कुछ भी भोजन में लेते रहते हैं। जिससे मोटापा, हृदय, उदर, त्वचा आदि के अनेक रोगों से ग्रस्त देखे जाते हैं। आहार की लघुता तथा गुरुता
के आधार पर पचने का समय अलग-अलग होता है। लघु द्रव्यों में वायु तथा अग्नि
गुण की अधिकता होती है। गुरु द्रव्यों में पृथ्वी तथा सोम (जल)
गुण अधिक होते हैं।
प्रकृति (वात,
पित्त, कफ)- अपने प्रकृति के अनुकूल
भोजन लेने से स्वास्थ्य स्थिर रहता है|
उम्र (अवस्था)- वय के अनुसार
बचपन में कफ प्रधान, युवावस्था में त्रिदोष साम्य तथा वृद्धावस्था में वात नाशक आहार
की आवशयकता होती है कार्य (श्रम)- श्रम की दृष्टि से आहार को शारीरिक तथा मानसिक दो भागों में विभक्त कर सकते हैं। शारीरिक श्रम करने वाले व्यक्ति यानि किसान व मजदूर वर्ग। मानसिक श्रम करने वाले यानि शिक्षण से जुड़े लोग जैसे शिक्षक, डॉक्टर, वकील, लेखक, वैज्ञानिक आदि।
ऋतु (मौसम)- भोजन में हमें वही वस्तु लेनी चाहिए जो ऋतु के अनुकूल हो। किसी
भी ऋतु का खाद्य पदार्थं किसी दूसरे ऋतु में सेवन नहीं करना चाहिए। आम, तरबूज
गर्मी में तथा जामुन बरसात में होता है तो उसे उसी ऋतु में सेवन करना चाहिए संग्रह
किया हुआ किसी दूसरे ऋतु में नहीं क्योंकि प्रकृति हमें हमारे स्वास्थ्य की रक्षा और
शरीर की आवश्यकता के हिसाब से ही खाद्य पदार्थों को उत्पन्न करती है। स्वाद- भोजन स्वादिष्ट होना चाहिए लेकिन अधिक मिर्च-मसाले
आदि का कृत्रिम स्वाद वाला नहीं। भोजन का प्राकृतिक स्वाद कृत्रिम स्वाद से बहुत ही अच्छा और स्वास्थ्य वर्धक होता है।
स्वच्छता- भोजन बनाने से लेकर
परोसने तक स्वच्छता पर विशेष ध्यान देना चाहिए।निर्माण- स्वास्थ्य के इच्छुक
व्यक्ति को अपने स्वजनों के द्वारा बनाया गया भोजन ही करना चाहिए यानि मां, बहन,
बेटी, पत्नी आदि के हांथों से बना भोजन ही स्वास्थ्यकर होता है क्योंकि ये रिश्ते जिस स्वच्छता, पवित्रता, प्रेम
व सकात्मक भाव से युक्त होकर हमारे मंगल की कामना करती हैं दूसरा नहीं कर सकता।
यदि हम उपर्युक्त बातों को ध्यान में रख कर आहार(Diet) का सेवन करें तो बिमारियों से बच सकते हैं।
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