स्वास्थ्य की पहचान (Health`s recognition) कैसे करें? कैसे जाने हम स्वस्थ हैं या अस्वस्थ (We are healthy or not?) ...........
स्वास्थ्य की पहचान
(Health`s recognition)
हम स्वस्थ हैं या नहीं कैसे जाने?
(We are healthy or not?)
हम स्वस्थ हैं या
नहीं कैसे जाने? क्या अपने स्वास्थ्य की जाँच के लिए चिकित्सक, डॉक्टर के पास जाना
जरूरी है? आज हमें अपने स्वास्थ्य को लेकर न जाने कितनी परेशानियों(Problems) का सामना करना
पड़ता है फिर भी हमें कुछ पता नहीं चलता कि स्वास्थ्य(Health) किसे कहते हैं? हम स्वस्थ कैसे
रह सकते हैं?
हम अपने स्वास्थ्य
के लिए तरह-तरह के परीक्षण (Test) करवाते हैं, पर न तो हमे अपनी बीमारी का पता चलता है न ही बीमारी से मुक्ति मिलती है। समय बीतने के साथ-साथ नई-नई और बीमारियां लगती जाती हैं। इन सब परेशानियों से मुक्ति पाने के लिए व अपने स्वास्थ्य के परीक्षण के लिए क्या करना चाहिए ! इसके लिए मैं अपनी ओर से नहीं बल्कि वेद तथा ऋषि के बातों को आपके सामने रखती हूँ। अपने स्वास्थ्य की पहचान के लिए आचार्य सुश्रुत जी ने बहुत ही सरल सूत्र दिया है कि हम स्वस्थ हैं या अस्वस्थ स्वयं जान सकें।
समदोष: समाग्निश्च
समधातुमलक्रियः। प्रसन्नात्मेन्दियमनाः स्वस्थ इत्यभिधीयते॥
इस श्लोक में आचार्य ने बताया है कि हमारे शरीर में शरीर संचालन के तीन साधन हैं- दोष, अग्नि और धातु।
दोष- वात पित्त, कफ। जब ये अपनी प्राकृत अवस्था में होते हैं तब प्रकृति (धातु) तथा विषम अवस्था में होते हैं तो दोष (विकृति) कहलाते हैं। वात(वायु) का कार्य होता है गति देना(ले जाना)। पित्त (अग्नि) का कार्य होता है जलाना या भस्म करना, पित्त से ही हमारे द्वारा खाये हुए भोजन का पाचन होता है। श्लेष्मा (कफ) का कार्य है स्थिर करना। जैसे- प्रकृति में तीन गुण (तत्व) सत्त्व, रज, तम है उसी प्रकार शरीर में वात, पित्त और कफ।
अग्नि- अग्नि का मतलब पित्त से है। जब पित्त का निर्माण अपनी मात्रा में होता है तो जठराग्नि
अच्छी होती है तथा हमारे द्वारा खाये गये भोजन का पाचन ठीक से होता है। जब पित्त की अधिकता व कमी होती है तो सीने में जलन, एसिडिटी, अरुचि, भूख की कमी आदि अनेक लक्षण दिखने लगते हैं जो आगे चलकर शरीर अनेक
रोगों का घर बन जाता है।
धातु- रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा और शुक्र। इसे सप्तधातु भी कहा जाता है। इनके निर्माण का आधार व समावस्था में बने रहना भोजन के पाचन, भोजन की शुद्धता, दोष, तथा अग्नि का अपने प्राकृत अवस्था में बने रहना है। इनका निर्माण क्रमानुसार होता है।
मलक्रिय- का मतलब है शरीर में निर्मित अनावश्यक पदार्थों (elimination of waste material from body) मल (stool), मूत्र (urine), स्वेद (sweat) आदि का निष्कासन तथा सोना-जागना (sleep-awake cycle) आदि क्रियाओं का होना। मल निष्कासन की क्रिया तभी सम्भव है जब उपर्युक्त क्रियाएँ ठीक से हो। उपर्युक्त क्रियाओं के ठीक रहने से आत्मा, इंद्रिय और मन तीनों ही प्रसन्न रहते हैं। इन तीनों का प्रसन्न रहने का अर्थ है हम स्वस्थ हैं।
इस श्लोक में आचार्य ने शरीर संचालन के 3 साधन बताया हैं – दोष, अग्नि, और धातु। दोष (वात, पित्त, कफ), अग्नि (जठराग्नि इससे भोजन का पाचन होता है) तीसरा है धातु (यह शरीर को धारण करता है) यानि शरीर को स्थिर रखता है।
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