भारत में पश्चिमी कुकर्म का अधिकारिक आगमन
भारत में पश्चिमी देशों का दो कचरा और आया। व्यभिचार फैलाने वाला एक नया कानून एक व्यभिचारी द्वारा 6/9/2018 को पास हुआ समलैंगिकता का। दूसरा पति-पत्नी किसी का किसी पर अधिकार नहीं है वो शादी के बाद भी किसी के साथ हमबिस्तर हो सकते हैं। फिर बच्चों का नाम किसका मिलेगा, पालन-पोषण की जिम्मेदारी किसकी होगी नालायक बाप का नायक औलाद(जज)। और वेश्यावृत्ति वालों व गृहस्थ-जीवन में अन्तर क्या होगा। मान-सम्मान का क्या अर्थ होगा। दोपायों-चौपायों में कैसे अंतर स्पष्ट होगा। वेद कहता है 'मनुर्भव' यह किसके लिए कहा जा रहा है नालायक। मानव के त्री ऐष्णाओं में पुत्रेष्णा (सन्तान) अपने जैसा जीव उत्पन्न करना, क्या ये समलैंगिकता से पूरी होगी।
ऐसे पशु संविधान बनायेंगे तो क्या होगा मानव का।जिस भारत को ऋषियों-मुनियों, महापुरुषों, त्यगी-तपस्वियों का देश कहा जाता था, कहा जाता है, कहा जाता रहेगा नालायक जज ने समाज व भारत को व्यभिचारियों का देश बना गया। अब तक विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण व खोट नियत के कारण लड़कियां और महिलाएं हबस का शिकार बनी हैं, तेजाब से जलाना या बलात्कार आदि। लेकिन अब इस कानून के कारण किसी स्त्री-पुरुष को इस चंगुल में फंसाया जा सकता है क्योंकि एक व्यभिचारी स्त्री-पुरुष किसी पर समलैंगिकता का प्रभाव दिखा सकते हैं।
स्त्रीलिंग -पुलिंग के साथ के बिना सृष्टि संतुलित नहीं रह सकती नहीं कोई सुख प्राप्त कर सकता है। भारत का संविधान एक अत्याचारी, व्यभिचारी ने बनाया अपने हिसाब से जो जीवन को अस्त-व्यस्त कर अशांति व दुखों के सागर में डूबाता है तथा जीवन को नर्क बनाता है।एक तरफ कचरा हटाओ स्वच्छता लाओं, दूसरी तरफ स्वच्छता हटाओ कचरा लाओं अभियान जारी है। साल में कुछ दिन झाडू लगाने से भारत स्वच्छ होगा नहीं कभी नहीं। इसमें भी फोटो खिंचवाने तक मतलब होता है। स्वच्छता तो विचार से आती है, विचार स्वच्छ होगा तो गंदगी फैलेगी ही नहीं। महर्षि पतंजलि ने योग का पहला-दूसरा अंग का नाम यम - नियम दिया है जिसमें स्वयं को शुद्ध बनाने की विधि है। जिनके 5-5भेद हैं।
सृष्टि का संविधान ईश्वर ने बनाया है। ईश्वर का संविधान सुख-शांति व खुशहाली प्रदान करता है। जिसे जो चाहिए वो अपनाये, स्वर्ग-नर्क दोनों का दरवाज़ा खुला है। स्वर्ग का रास्ता वैदिक-ज्ञान है जो ईश्वर प्रदत्त है और नरक का रास्ता व्यभिचारी मानव। अन्तर करने के लिए ईश्वर ने एक नहीं अनेक ज्ञानेन्द्रिय दिये हैं। ओ३म्
158 सालों से यानि गुलामी काल में समलैंगिकता को अपराध माना जाता था, पर आजाद भारत में 5 जजों ने इसे अपराध मुक्त कर दिया। ऐसा क्यों इस पर विचार करना चाहिए।

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