शनिवार, 20 अक्टूबर 2018

स्वस्थ कैसे रहें(How To Be Healthy)?




स्वस्थ कैसे रहें(How To Be Healthy)?

स्वस्थ जीवन की कामना हर व्यक्ति की होती है। प्रत्येक व्यक्ति चाहता है कि मुझे कोई रोग न हो लेकिन वह बच नहीं पाता है। शरीर अस्वस्थ होने के दो ही कारण ज्ञात होते हैं 1. स्वास्थ्य के लिए उपयोगी ज्ञान का अभाव या 2. उस ज्ञान की अवहेलना कर मनमानी करना। जो हमारे स्वास्थ्य लिए हितकारी है। स्वस्थ कैसे रहें इससे पहले हमें इस बात पर विचार करना होगा कि स्वास्थ्य क्या है? स्वास्थ्य की परिभाषा क्या है? स्वास्थ्य को समझने के लिए आचार्य सुश्रुत ने बहुत ही अच्छा सूत्र दिया हैंसमाग्निश्च समधातुमलक्रिय: प्रसन्नात्मेन्द्रियमना: स्वस्थ इत्यभिधीयते इस सूत्र के माध्यम से आचार्य ने बहुत ही सरलता से स्वास्थ्य को परिभाषित किया है कि कैसे जानें हम स्वस्थ हैं। 

से समझने के लिए यहां जायें- https://swasthkaserahen.blogspot.com/2018/09/healths-recognition-we-are-healthy-or.html

स्वस्थ कैसे रहें? स्वस्थ रहने के लिए आचार्य चरक का सूत्र है-



 त्रय उपस्तम्भा इति।आहारः स्वप्नो ब्रह्मचर्यमिति।


इस सूत्र में स्वस्थ जीवन के तीन आधार(स्तम्भ) बताया है। आहार, निद्रा और ब्रह्मचर्य। त्रय का अर्थ तीन, उप का अर्थ सहायक और स्तम्भ का अर्थ होता है खम्भा। जिस प्रकार मकान का आधार खम्भे होते हैं उसी प्रकार शरीर को स्वस्थ रखने के लिए आहार, निद्रा और ब्रह्मचर्य आधार हैं। मकान में दो प्रकार के खम्भे होते हैं प्रधान तथा अप्रधान। यहां शरीर आत्मा के लिए मकान है और इस मकान का प्रधान स्तम्भ है वात, पित्त, कफ। इन तीनों (वात, पित्त, कफ) के संतुलन का आधार आहार, निद्रा तथा ब्रह्मचर्य रूपी ये तीन स्तम्भ ही हैं।

1. आहार- अन्न के महत्व को आचार्य ने (सूत्रस्थान 27) में बताया है-

प्राणाः प्राणाभृतामन्नं लोकोऽभिधावति। वर्णः प्रसादः सौस्वर्यं जीवितं प्रतिमा सुखम्॥

तुष्टिः पुष्टिर्बलं मेधा सर्वमन्ने प्रतिष्ठितम्। लौकिकं कर्म यद् वृतौ स्वर्गतौ यज्ञ वैदिकम्॥ 

कर्मापवर्गे यश्चोक्तं तश्चाप्यन्ने प्रतिष्ठितम्।

अन्न प्राणियों का प्राण है अतः सारा संसार इसी अन्न की ही याचना करता है। वर्ण, प्रसन्न्ता, सुस्वरता(अच्छे स्वर का होना), जीवन, प्रतिमा, सुख, संतोष, शरीर की पुष्टि, बल, मेधा (धारणाशक्ति) ये सभी वस्तु अन्न से ही प्रतिष्ठित है। शारीरिक व्यापार के लिए जो लौकिक कर्म है, स्वर्ग की कामना के लिए जो वैदिक कर्म किये जाते हैं तथा मोक्षसाधक जो कर्म बताये गये हैं वे सभी कर्म अन्न में ही प्रतिष्ठित है। अर्थात् बिना अन्न के संसार में कोई कार्य नहीं किये जाते, अतः अन्न सर्वश्रेष्ठ है।

आचार्य सुश्रुत कहते हैं- वातपित्तश्लेमाण एव देहसम्भवहेतवः। तैरेव्यापन्नैरधोमध्योर्ध्वस्न्नैविष्टैः शरीरमिदं धार्यतेऽगारमिव स्थूणाभिस्तिसृभिरतश्च त्रिस्थूणमाहुरेके। (सू. अ २१,) वात, पित्त, कफ ये तीन ही शरीर उत्पति के हेतु (Causes of genesisof the body) हैं। ये स्वस्थ यानि विकाररहित स्थिति में नीचे, मध्य और उपर शरीर को धारण किये हुये है। जैसे- कोई भवन(घर), छप्पर को धारण किया जाता है वैसे ही ये शरीर इन तीन खम्भों पर टिका हुआ है। इसीलिए इस शरीर को त्रिस्थूण भी कहा जाता है।इन तीनों उपस्तम्भों का युक्तिपूर्वक सेवन करने से यह शरीर उपस्तब्ध(स्थिर) होकर जबतक संस्कारित रहता है तबतक व बल, वर्ण, उपचय(वृद्धि) से उपचित होकर उचित रूप में रहता है। यहां संस्कार का मतलब है अहित वस्तुओं का सेवन न करना। इन स्तम्भों में आहार को प्रधान माना है, क्योंकि आहार से ही रस की उत्पति, वातादि दोषों की उत्पति तथा धातुओं का निर्माण होता है ।आहार के विषय में अन्य ग्रंथों में आचार्यों के विचार

आहार की प्रधानता बताते हुये आचार्य सुश्रुत ने सू. प्र. . वेदोत्पत्तिअध्याय. २७ में कहा है- 

प्राणिनां पूनर्मूलमाहारो बलवर्णौजसां च। स षट्सु रसेष्वायतः, रसाः पुर्नर्द्रव्याश्रयाः द्रव्याणि पुनरोषधय॥ प्राणियों का मूल आहार है तथा आहार से ही प्राणियों में बल (Strengh), वर्ण (Complexion), तथा ओज (Vilality resistance) की उत्पत्ति होती है। वह आहार मधुरादि छः रसों के अधीन है और रस द्रव्यों के अधीन है। द्रव्य औषधियां हैं।

छान्दोपनिष्द् (/२६// सप्तम प्रपाठक, छब्बीसवां खण्ड, कण्डिका २ ) में-

आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः सत्त्वसुद्धौ ध्रुवा स्मृतिः स्मृतिलम्भे सर्वग्रंथीनां विप्रमोक्षः।

अर्थात् आहार की शुद्धी से सत्त्व की शुद्धि होती है, सत्त्व शुद्धी से बुद्धि निर्मल और निश्चयी बन जाती है। निर्मल व पवित्र बुद्धि से निर्णय लेने की क्षमता बढ़ती है। सही-गलत की पहचान करने में कठिनाई नहीं होती। व्यक्ति सुखकारी निर्णय लेकर दुःखों से बच जाता है या बच सकता है।

2. स्वप्न(निद्रा)- जिस प्रकार स्वास्थ्य रक्षा के लिए शुद्ध मिट्टी, पानी, धूप, हवा, आहार आदि की आवश्यकता है उसी प्रकार निद्रा की भी आवश्यकता है। यदि व्यक्ति पूरी निद्रा ले तो शारीरिक मानसिक दोनों प्रकार से रोगी हो जायेगा। आचार्य वाग्भट (अन्नरक्षा अध्याय ) में कहा है-

निद्रायत्तं सुखं-दुःखं पुष्टिः कार्श्यं बलाबलम्। वृषता क्लीबता ज्ञानमज्ञानं जीवितं च॥अकालेऽतिप्रसङ्गाच्चा निद्रा निषेवेता। सुखायुषी पराकुर्यात् कालरात्रिरिवापरा॥

सुख-दुःख, पुष्टता-कृशता, बल-अबल, वृषता-क्लीबता, ज्ञान-अज्ञान, जीवन-मृत्यु सभी निद्रा के अधीन है। अकाल समय (बिना समय के) में निद्रा का सेवन करने से, अतिनिद्रा से और निद्रा का सर्वथा त्याग कर देने से सुख एवं आयु(सुखायु एवं हितायु) का नाश होता है। अकाल निद्रा, अतिनिद्रा एवं अनिद्रा तीनों ही कालरात्री अर्थात् मरण रात्री के समान है।

3. ब्रह्मचर्य- ब्रह्मचर्य का अर्थ होता है विद्या के ग्रहण में विचरना, रमण करना, किसी भी कार्य को संयम पूर्वक करना। स्वास्थ्य की दृष्टि से ब्रह्मचर्य का मतलब है शारीरिक शक्ति के स्रोत सप्तधातुओं  में से अन्तिम धातु शुक्र की रक्षा करना। शुक्र आहार का सार तत्त्व है जिसका उपयोग सन्तान उत्पत्ति के लिए करना चाहिए, इसका दुरुपयोग करने से शारीरिक, मानसिक चारित्रिक पतन होता है।आचार्य सुश्रुत (चि. . 24.111) में कहा हैं अति स्त्रीप्रसग से बचना चाहिए। क्योंकि शुक्र के दुरुपयोग से शूल (pain), कास (Cough), ज्वर (Fever), श्वास (Asthma), कृशता(कमजोरी), पाण्डु(पीलिया-Jaundice या रक्ताल्पता-Anaemia), क्षय(टी.बी) आक्षेप आदि अनेक रोगों से शरीर ग्रस्त हो जाता हैं।


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